Sunday, 4 September 2011

दुःख का साथी

सब खुशियाँ तुम्हें मुबारक हों ,
तुम सारी अकेले खर्च करो , 
हम साथ नहीं , कुछ बात नहीं
हर जगह ज़रूरी साथ नहीं 
पर जब ग़म ज्यादा गहराए , 
तब याद मुझे कर लेना तुम !

रोजाना ही कुछ मिलते हैं,
रोजाना ही गुल खिलते हैं.
वो बहुत निराले लगते हैं,
भले साथ तनिक ही चलते हैं.
जब गुलशन सूना हो जाये,
गुल और कहीं जब  मुस्काए,
तन्हाई जब तुमको खाए ,
तब याद मुझे कर लेना तुम !!

जब गरज़ पड़ी तब याद किया,
हमने हरदम ही साथ दिया,
तुमने भी शुक्रिया नज़र किया,
पर लम्हे में बेशुकर किया.
हम तुमसे वजह तो तब पूछे ,
जब रूह को हमारी गवारा हो.
हम भी हम हैं , हमें मालूम है ,
तुम ख़ुश आबाद दोबारा हो.

जब वक़्त गुज़र यह जायेगा,
अपना ही जब ठुकराएगा ,
या मतलब कोई आयेगा,
तब याद तुम्हें आएंगे हम !!!

Friday, 1 July 2011

घातक तेरा धन्यवाद !

- मयंक शर्मा 

झटकों पर झटके झेल गया 
तू तूफानों से खेल गया |
कितने दुःख कितने ज़हर मिले 
तू सबको हृदय में उड़ेल गया |

तन मन धन समर में लगा दिया
पर अंतिम पड़ाव पर हारा |
चुप तनिक रहा फिर पुनः जुटा
यू यथार्थ तुने स्वीकारा |

तेरी यह प्रकृति विलक्षण है,
दुःख संकट तेरा भक्षण है |
क्षण से धिक गर दुःख हृदय पले,
यह वीरो का नहीं लक्षण है |
जब जब नियति ने घात किया,
तुने तत्क्षण प्रतिघात किया |
फिर कैसा अनोखा वार है यह ,
जिसने तुझपर आघात किया |

मत रो इसपर मत शोक मना,
आघात हुआ पर सबक मिला |
दुनिया में रह दुनिया का न हो ,
फिर कैसी ख़ुशी और कौन गिला |

जब वक़्त गुजर यह जाता है,
तो सबका घाव भर जाता है |
जो दो क्षण में ही घाव भरे,
वह हृदयवीर कहलाता है |

देह से वीर बहुतेरे हैं , 
हृदयावीरों की कम गिनती है |
तू हृदयवीर है गर्वित हो ,
यह मन की मन से गिनती है |

इस घात ने कुछ नहि नाश किया ,
केवल दौर्बल्य विनाश किया |
जो हृदय ज़रा सी चादर था ,
उसको फैला आकाश किया |

अब ख़त्म हुआ तेरा प्रमाद ,
गुंजित कर फिर से विजयनाद |
आघात तुझे लख धन्यवाद ,
घातक तुझको सौ साधुवाद |

Tuesday, 14 June 2011

विकल्प

        विकल्प



बचपन से सुना था ,

किस्से कहानियो में , दादा दादी की बातो में ,
कई नए उदाहरण देकर , बड़े लोग समझाते थे.
दो नावो की सवारी , हमेशा पड़ती भारी.
कुछ बड़ा हुआ तो पढ़े  , पुराने कवियों के मुक्तक .
शब्द नए भाव वही,
लालच में दोनों गए , माया मिली न राम .


न जाने क्यों कभी माना नहीं इस बात को.
तर्क नहीं स्वीकार सका पुराने वक्तव्यों को,
कही एक ही नाव रखी और वही डूब गयी तो .

दो नावो की सवारी , हमेशा पड़ती भारी.
सुनी सबसे पर मान कभी नहीं पाया .

हमेशा हर जगह दूसरी नाव तैयार रखी मैंने,
पहली से कमज़ोर पर ज्यादा उपयोगी .
पहले से कम तीव्र पर बाधाओं के सामने टिकाऊ ,
जो भले ही उतनी तेज़ न हो पर उसके मुकाबले डूबे नहीं .
ताकि इसके डगमगाते ही दूसरी नाव में सववर हो सकू फ़ौरन .

आज डूबता देखता हूँ , एक नाव वालों को, 
उनकी मजबूत , तेज़ , सुंदर नाव डूब रही है उन्हें लेकर .
शुक्र है मेरे पास दूसरी नाव है , 
हल्की सही , कमज़ोर सही , बदशक्ल सही , बेकार सही -
पर क्या तिनका बड़ा सहारा नहीं डूबने वाले को .

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Sunday, 1 May 2011

क्या उसको प्यार कहोगे ?


अब मेरे भूखे रहने से तुमको फर्क नहीं पड़ता है, ,
और तुम्हारा प्राणांतक श्रम मुझको तनिक नहीं हड़ता है.
नहीं प्रशंसा अब एक दूजे से केवल उपलंभ का नाता,
तुमको मेरा मुझे तुम्हारा कोई नखरा रूप ना भाता.
मिलने जुलने बतलाने में नहीं रहा जब रस तब फिर क्या
चंद बार के शारीरिक संबंधो को ही प्यार कहोगे ?

अब बतियाना खाना पूरी मिलने से कुछ मिटे न दूरी
कष्ट तुम्हारा मुझे हसाए तुम्हे रुचे मेरी मजबूरी
अब दिल नहीं तुम्हारा दुखता पीड़ा जब मुझको तडपाती
तुम पर जब संकट मंडराए तब मेरी फटती नहीं छाती 
इसपर भी इक दूजे कि पीड़ा पर व्याकुलता का दिखावा,
व्यर्थ दिलासाझूठी तसल्ली को ही क्या आधार कहोगे ?
इक दूजे हित जो किया धरा उसकी ही चर्चा अब आये
जो प्रेम हेतु थे कष्ट सहे वह अब उपकार की उपमा पाए
मेरा उपकार बड़ा, तेरा छोटा तू परम कृतघ्न रहा,
तुमने न कोई एहसान किया, अब यही वार्तालाप रहा.
क्या बतलाने जतलाने ही को , इक दूजे हित रोए थे ?
क्या आक्षेपों से भरे हुए , इस विवाह को साहचर्य कहोगे?
मिलने जुलने बतलाने में , नहीं रहा जब रस तब फिर क्या,
चंद बार के शारीरिक संबंधो को ही प्यार कहोगे .....

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Wednesday, 20 April 2011

जाओ क्या साथ निभाओगे ?

जाओ क्या साथ निभाओगे ?

                                 - मयंक शर्मा

जीवन पथ मेरा दुर्गम है ,
फिर काँटों से भी भरा हुआ .
मंजिल की कोई आस नहीं ,
कोई साधन भी है पास नहीं.
चलते चलते थक जाओगे
तब तुम क्या साथ निभाओगे ?

उल्लास का इसमें नाम नहीं,
यह कोई रास्ता आम नहीं.
यहाँ समय नहीं सुस्ताने को,
हसने को , मन बहलाने को .
नीरस कब तक चल पाओगे
और कब तक साथ निभाओगे??

ज़िम्मेदारी ने जकड़ा है,
यह बहुत कठिन पथ पकड़ा है.
स्वेच्छा से सफ़र नहीं होता है,
हर कदम पे एक समझौता है.
कितना मन को समझोगे ,
और कितना साथ निभाओगे ?

जाने कितनो ने छोड़ा है ,
कितनो ने ही मुंह मोड़ा है,
यहाँ गुजर  नहीं है वादों की,
यहाँ गरज है अटल इरादों की.
कैसे वह स्तर पाओगे ?
जाओ , क्या साथ निभाओगे ??