Tuesday, 14 June 2011

विकल्प

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बचपन से सुना था ,

किस्से कहानियो में , दादा दादी की बातो में ,
कई नए उदाहरण देकर , बड़े लोग समझाते थे.
दो नावो की सवारी , हमेशा पड़ती भारी.
कुछ बड़ा हुआ तो पढ़े  , पुराने कवियों के मुक्तक .
शब्द नए भाव वही,
लालच में दोनों गए , माया मिली न राम .


न जाने क्यों कभी माना नहीं इस बात को.
तर्क नहीं स्वीकार सका पुराने वक्तव्यों को,
कही एक ही नाव रखी और वही डूब गयी तो .

दो नावो की सवारी , हमेशा पड़ती भारी.
सुनी सबसे पर मान कभी नहीं पाया .

हमेशा हर जगह दूसरी नाव तैयार रखी मैंने,
पहली से कमज़ोर पर ज्यादा उपयोगी .
पहले से कम तीव्र पर बाधाओं के सामने टिकाऊ ,
जो भले ही उतनी तेज़ न हो पर उसके मुकाबले डूबे नहीं .
ताकि इसके डगमगाते ही दूसरी नाव में सववर हो सकू फ़ौरन .

आज डूबता देखता हूँ , एक नाव वालों को, 
उनकी मजबूत , तेज़ , सुंदर नाव डूब रही है उन्हें लेकर .
शुक्र है मेरे पास दूसरी नाव है , 
हल्की सही , कमज़ोर सही , बदशक्ल सही , बेकार सही -
पर क्या तिनका बड़ा सहारा नहीं डूबने वाले को .

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