Monday, 28 November 2011

Bachchan's good work


here's bachchan's philosophy . Although he became great because of congress's support which he earned for his originality as a civilian, he was not independent to write anything which came to his mind , he couldn't write against emergency , drawbacks of "Panchvarshiya yojnas" , and government and had to restrict himself in philosophy and romance............. However he had a great brain and great philosophical view.......   Here's one of the best work which motivates me to forget biggest losses in life......








जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फ़िर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फ़िर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं,मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई
                                                  —   हरिवंशराय बच्चन

Friday, 25 November 2011

तुम्हारे जाने के बाद


जब भी मैं सोकर उठता हूँ,
सब कुछ भूल चुका होता हूँ.
उठकर अंगड़ाई लेकर जब ,
तुम्हे सोचकर मुस्काता हूँ ,
तब कुछ मुझको याद आता है
इक धक्का सा लग जाता है .
आँखें फिर से बुझ जाती हैं,
और मुस्कान चली जाती है। 
फिर रोता हूँ , चिल्लाता हूँ.
तुमको भूल नहीं पता हूँ.

क्या ये तुम्हारे साथ नहीं है ?
क्या मुझमें वो बात नहीं है ?
मैं ज्यादा जज्बाती हूँ या
तुममें कुछ जज़्बात नहीं है?

तुम्हें हंसाये , तुम्हें रुलाये ,
रह रहकर तुमको याद आये ,
ऐसा कुछ भी नहीं हुआ क्या ?
इश्क ने तुमको नहीं छुआ क्या ?
क्यों मुझको तुमको पाना है ,
फिर से वह सब दोहराना है .

खुदा ! तुझे क्या नामुमकिन है ?
कर दे गर इतना मुमकिन है .
क्या तू ऐसा कर सकता है ,
उसको याद दिला सकता है .
कि मैं भूल नहीं पाया हूँ ,
अब तक मैं उसका साया हूँ .
और कभी भूल नहीं पाऊंगा ,
मरते दम तक दोहराऊंगा .


है उम्मीद तुम्हें है आना ,
पर क्यूँ इतनी देर लगाना .
जल्दी आओ देखो मैंने
छोड़ रखा है पीना खाना .
ज्यादा देर न तुम कर देना
नाउम्मीदी मत भर देना .
जीना मुश्किल हो जाएगा ,
गर देर से याद तुम्हें आएगा.

पता नहीं दिल की चलती है ,
या ये सोचना भी मेरी गलती है .

Monday, 12 September 2011

पछतावा

दोनों के सुन्दर सपने थे ,
दोनों ने उनपर काम किया .
दोनों कर्मठ दोनों सक्षम ,
दोनों ने नहीं आराम किया .

दोनों के उपाय प्रभावी थे,
दोनों ही पूर्ण प्रयासी थे .
दोनों के अपने उसूल थे ,
दोनों ही आत्मविश्वासी थे .



दोनों के तरीके विफल हुए ,
दोनों का सपना टूट गया .
एक ने यह प्रहार सहन किया,
दूजे का साहस छूट गया .

अब यहाँ से दोनों पृथक हुए ,
दोनों ने अलग विचार किया .
इक तो रोने में लगा रहा ,
दूजे ने अलग उपचार किया.

उसने अगला सपना पाला ,
यह पिछली यादों में खोया .
उसने नवीन ईंटें जोड़ी ,
यह पिछले मकान पर रोया .

दोनों पर दुनिया खूब हंसी ,
एक दुखी हुआ , एक भूल गया.
दोनों पे व्यंग्य शर बरसे थे ,
एक झेल गया एक झूल गया .

जो झेल गया जो भूल गया
जो लगा रहा वह पाएगा .
टूटें उसके असंख्य सपने ,
वह पुनः जोड़ता जायेगा .

जो झूल गया जो दुखी हुआ,
जो रोया है पछताया है .
उसका यह सफ़र समाप्त हुआ,
कुछ हाथ न उसके आया है .

यह रोना धोना पछताना ,
सब कमजोरों के बहाने हैं .
एक सपने पर क्या रोना है ,
सपने तो बिखर ही जाने हैं .

फिर फिर टूटें , फिर फिर जोड़ो,
अभ्यास प्रबल हो जायेगा .
फिर कैसा भी सपना टूटे ,
पछतावा कभी न आएगा .

Saturday, 10 September 2011

बदलाव


खुद में अंतर देखता हूँ कुछ दिनों से , 
तोलती है आत्मा व्यवहार मेरा , 
हर किसी के संग और फिर तुम्हारे संग,
और आता  गुप्त यह सन्देश मन से , 
या तो दोहरा हो गया व्यवहार मेरा
या ज्यादा खास से कुछ हो गए तुम !

दुसरो को भूल जाता याद करना ,
फ़ोन करना मेल करना या कि मिलना .
दिल पे रहता हर घडी कब्ज़ा तुम्हारा ,
उँगलियाँ डायल करें नंबर दोबारा ,
पासवर्ड भी अब तुम्हारे नाम पर और जन्मदिन पर,
देखकर होता मुझे अचरज कदाचित ,
समझ न आये की मैं बदला हुआ हूँ ,
या अलग अब भीड़ से कुछ हो गए तुम ?

दूसरों की उपेक्षा से क्रोध जनता ,
उपेक्षित हो तुमसे दारुण दुःख पनपता .
कई दिन तक चले उलझन , जब तुड़े नाता किसी से,
तुमसे पल भर की भी उलझन क्यों ये दिल सुलझाना चाहे ?
प्रेम भर यह नहीं केवल , प्रेम तो प्रियजनों से भी .
आत्मीयों से घटा व्यवहार मेरा ,
या कि उनसे कहीं ऊपर चढ़ गए तुम ?

तुम बने अब इक ज़रूरी सी ज़रूरत ,
वायु , जल, भोजन, बसेरे से भी बढ़कर .
याद भर मन कार्य से मेरा हटाती,
तुम हो खुश तो कोई भी चिंता न खाती .
कहो क्या मैं निष्क्रिय अब हो चला हूँ ,
या कि कर्मठता पे भारी पड़ गए तुम ?

कोई बतलाये कि मैं बदला हुआ हूँ ,
या ज्यादा खास से कुछ हो गए तुम ?

Monday, 5 September 2011

आगाज़ की उम्मीद

ख्वाबो में है मेरे भी उन आसमानो की बुलंदी,
पर अभी निश्चित नहीं कब उड़ने का आगाज़ होगा.

कई वक्रो , कई मोड़ो बाद शायद सफलता है ,
हर विपद पर मन को समझाता ये अंतिम विफलता है.
रास्तो के बदलते ही शिखर पर हम जा लगेंगे.
पर अभी निश्चित नहीं कब मुड़ने का आगाज़ होगा.

प्रयासो की विफलता ने घाव गहरे कर दिए हैं.
कुछ से थी मरहम की आशा , ग्रहण पर सबने दिए हैं.
सफलता के नीर से ही व्रण ये सारे स्वच्छ होंगे,
पर नहीं यह जानता कब धुलने का आगाज़ होगा.

अवसरो की प्रतीक्षा में, धैर्य का भी धैर्य टूटा ,
परम सद्व्यवहार पर भी नेहियों का नेह रूठा .
सभी रूठों को शुभा देवी तुम्ही अब मनाओगी .
जब उठूंगा धूल से और मेरा भी सम्राज होगा .

है विधी जिद्दी भयंकर , कष्ट देते यह न थकता ,
कोई इसको दे चुनौती , यह तनिक भी सह न सकता .
मगर शायद गलत इसने मुझे स्पर्धी चुना है,
मेरी बेशर्मी का इसको , शायद नहीं अंदाज़ होगा .

ख्वाबो में है मेरे भी उन आसमानों की बुलंदी,
पर अभी निश्चित नहीं कब उड़ने का आगाज़ होगा !



Sunday, 4 September 2011

दुःख का साथी

सब खुशियाँ तुम्हें मुबारक हों ,
तुम सारी अकेले खर्च करो , 
हम साथ नहीं , कुछ बात नहीं
हर जगह ज़रूरी साथ नहीं 
पर जब ग़म ज्यादा गहराए , 
तब याद मुझे कर लेना तुम !

रोजाना ही कुछ मिलते हैं,
रोजाना ही गुल खिलते हैं.
वो बहुत निराले लगते हैं,
भले साथ तनिक ही चलते हैं.
जब गुलशन सूना हो जाये,
गुल और कहीं जब  मुस्काए,
तन्हाई जब तुमको खाए ,
तब याद मुझे कर लेना तुम !!

जब गरज़ पड़ी तब याद किया,
हमने हरदम ही साथ दिया,
तुमने भी शुक्रिया नज़र किया,
पर लम्हे में बेशुकर किया.
हम तुमसे वजह तो तब पूछे ,
जब रूह को हमारी गवारा हो.
हम भी हम हैं , हमें मालूम है ,
तुम ख़ुश आबाद दोबारा हो.

जब वक़्त गुज़र यह जायेगा,
अपना ही जब ठुकराएगा ,
या मतलब कोई आयेगा,
तब याद तुम्हें आएंगे हम !!!

Friday, 1 July 2011

घातक तेरा धन्यवाद !

- मयंक शर्मा 

झटकों पर झटके झेल गया 
तू तूफानों से खेल गया |
कितने दुःख कितने ज़हर मिले 
तू सबको हृदय में उड़ेल गया |

तन मन धन समर में लगा दिया
पर अंतिम पड़ाव पर हारा |
चुप तनिक रहा फिर पुनः जुटा
यू यथार्थ तुने स्वीकारा |

तेरी यह प्रकृति विलक्षण है,
दुःख संकट तेरा भक्षण है |
क्षण से धिक गर दुःख हृदय पले,
यह वीरो का नहीं लक्षण है |
जब जब नियति ने घात किया,
तुने तत्क्षण प्रतिघात किया |
फिर कैसा अनोखा वार है यह ,
जिसने तुझपर आघात किया |

मत रो इसपर मत शोक मना,
आघात हुआ पर सबक मिला |
दुनिया में रह दुनिया का न हो ,
फिर कैसी ख़ुशी और कौन गिला |

जब वक़्त गुजर यह जाता है,
तो सबका घाव भर जाता है |
जो दो क्षण में ही घाव भरे,
वह हृदयवीर कहलाता है |

देह से वीर बहुतेरे हैं , 
हृदयावीरों की कम गिनती है |
तू हृदयवीर है गर्वित हो ,
यह मन की मन से गिनती है |

इस घात ने कुछ नहि नाश किया ,
केवल दौर्बल्य विनाश किया |
जो हृदय ज़रा सी चादर था ,
उसको फैला आकाश किया |

अब ख़त्म हुआ तेरा प्रमाद ,
गुंजित कर फिर से विजयनाद |
आघात तुझे लख धन्यवाद ,
घातक तुझको सौ साधुवाद |