Saturday, 19 May 2012

रबड़ के उसूल



 मुझे राजा दशरथ की कहानी याद है. उसने कैकेयी को वचन दिए थे . " प्राण जाये पर वचन न जाये " उसका उसूल था. वही उसने किया . जान दे दी पर उसूल से न हटा. मजबूत उसूलों की यही कमी है, ये हमेशा खुद का नुकसान कराते हैं. दशरथ से लेकर मुंशी प्रेमचंद* जैसे उसूलवादियों से मैं वाकिफ हूँ , सबको उनके उसूलों ने धोबी पछाड़ मारा है. मुझे लगता है कि पुराने समय में उसूल बहुत मजबूत मटेरिअल के बनाए जाते थे. आदमी टूट जाता था पर क्या मजाल कि उसूल टूट जाए. एक उसूल पर पीढियां निकल जातीं थीं.
                                         अब ज़माना बदला है. एक उसूल से पीढ़ी तो क्या एक आदमी का काम चलना भी मुश्किल है. बीते दिनों अन्ना के आन्दोलन से प्रभावित होकर हमने उसूल बनाया था - " रिश्वत नहीं देंगे , किसी कीमत पर नहीं " . पालन भी किया. ट्रैफिक पुलिस वाले को 100/- की रिश्वत न देकर 600/- का चालान मैंने भरा है. पर कब तक ? मजबूत उसूलों की यही कमी है, ये हमेशा खुद का नुकसान कराते हैं. पिछले महीने का बिजली का बिल आया है. 5000/- रुपए ! मैं हैरान हूँ . बिजली से चलने वाले जितने संसाधन मेरे घर में हैं , उन्हें 24*7 चलाने पर भी इसका तिहाई बिल आना असंभव है. भूलसुधार की अपील करने पर कहा गया - " साहब यह प्रिंटिंग मिस्टेक है. इतनी आसानी से ठीक नहीं होगी. हमारे नेता भी अपने भाषण की प्रिंटिंग मिस्टेक अपने आप ठीक नहीं करते और कुछ का कुछ बोल जाते हैं. शायद आपने 3 idiots फिल्म नहीं देखी , प्रिंटिंग मिस्टेक 'चमत्कार' को 'बलात्कार' में बदल सकती है." मैंने झल्लाकर हल पूछा तो बताया गया - " आप अभी बिल भर दीजिये , साथ ही इन्वेस्टिगेशन की अर्जी लगा दीजिये. पॉजिटिव होने के केस में amount वापस मिल जायेगा." मैं इन्वेस्टिगेशन से बहुत डरता हूँ. बोफोर्स से लेकर आरुषि तक का इन्वेस्टिगेशन पेंडिंग है. कहीं ऐसा न हो के इन्वेस्टिगेशन पूरा होते होते मेरा परपोता अधेड़ हो चुका हो. तब की मंहगाई में वो 5000  में अपने पोते के लिए कैंडी भी नहीं खरीद पायेगा. मेरा सर घूम गया और मैंने उसूल को भी थोडा सा घुमा दिया. 200 रूपए बड़े बाबू के हाथ पर रखे और 500 रूपए का बिल भरकर पक्की रसीद ले ली. अब मैं बड़े बाबू की चाय पानी का ध्यान रखता हूँ. नहीं तो साला प्रिंटिंग मिस्टेक करवा देगा. अब मेरा उसूल है - " जब तक नुकसान अफोर्डेबल है, रिश्वत नहीं देंगे". कौन जाने कल हो जाये - "जब तक कायदे का फायदा न मिले, रिश्वत नहीं देंगे." उसूल में मैंने एक adjustable space बना लिया है. बखत जरुरत के हिसाब से मैं वहां कुछ भी घुसा देता हूँ. यों मुख्य भाग ज्यों का त्यों है - "रिश्वत नहीं देंगे".
                         यहाँ तक फिर भी ठीक है. कई बड़े लोग उसूल का मटेरिअल ही बदल देते हैं जिससे उसका कायाकल्प किया जा सके. वर्माजी हैं. बहुत अच्छे आदमी. बहुत अच्छा उसूल ( जो गाली गलौच ज्यादा लगता है.) - " सारे नेता चोर हैं. सारे भ्रष्टाचारी. हम तो कुत्ते का भरोसा कर लेंगे पर नेता का नहीं." (यों कुत्ता नेता से ज्यादा भरोसेमंद है ये सब जानते हैं.)  पर पिछले महीने एक मंत्रीपुत्र (और संभवतः भावी मंत्री) से वर्मा जी  की बेटी की शादी हो गयी. अब उन्होंने पुराना उसूल त्यागकर नया उसूल धारण किया जैसे आत्मा पुराना शरीर त्यागकर नया शरीर धारण करती है - "कुछ ईमानदार और कर्मठ नेता भी हैं (उनके समधी साहब) पर लोग उनपर विश्वास नहीं करते." मैंने बहुत जोड़ - घटा किया, किसी तरेह का adjustment  नहीं है यहाँ वरन उसूल का संपूर्ण कायापलट हो गया है. ऐसा तभी संभव है जब उसूल किसी बहुत ही लचीले पदार्थ का बना हो जैसे - प्लास्टिक,रबड़ , मोम , गीली मिटटी, कीचड़ , कचरा , मैला आदि आदि ....................
                                शीशे के उसूल और भी बेहतर. यहाँ उसूल की शेप चेंज नहीं करनी होती. ये सस्ते, सुन्दर और use and throw होते हैं , पर टिकाऊ होना संदिग्ध है. पैसे वाले पॉवरफुल लोग ऐसे उसूल रखते हैं. यहाँ यह बात काबिलेगौर है की नया उसूल अपनाते ही पुराना वाला तोड़ के फेंक देना ज़रूरी है. use and throw उसूल , चमचमाते उसूल, सस्ते उसूल, शीशे के उसूल ! वाह !
                                रबड़ के उसूल तो अति उत्तम. न हर बार नया उसूल लेने का झंझट, न उसूल बदलने में कोई मेहनत. super flexible quality , durability की guarantee. हमारे लीडर्स ऐसे ही उसूल रखते हैं. तभी तो देश के कर्णधार हैं. दो राजनीतिक पार्टियाँ हैं. यहाँ सुभीते के लिए एक को 'चोर' पार्टी कहेंगे और एक को 'लुटेरा' पार्टी. अभी लुटेरे सत्तारूढ़ हैं. चोर उन्हें गरियाते हैं. दोनों ही दल सुपर फ्लेक्सिबल रबड़ के उसूलों से सुसज्जित हैं. अपनी रैलियों में चोर पार्टी के नेता चिल्लाते हैं - "ये लुटेरा सरकार घोटालों की सरकार है. ये सब भारत माता के व्यापारी हैं. इनकी गलत नीतियों के चलते देश बर्बाद हुआ जाता है. अगर सुख, समृद्धि और खुशहाली चाहते हैं तो आगामी चुनाव में 'चोर' पार्टी को भारी मतों से विजयी बनायें और मंहगाई और भ्रष्टाचार पर काबू पायें."
                                'लुटेरा' पार्टी प्रतिवाद करती है - "अगर यही लोग देश के हितचिन्तक होते तो चुनाव क्यों हारते ? हारे इसलिए क्योंकि विकास और 'आम आदमी' की समस्याओं पर ध्यान न देकर उन्होंने 'अमरीकापरस्ती' पर ज्यादा ध्यान दिया. सारा विदेशी मुद्रा कोष इन्होंने 'सब्सिडी' दे-देकर खाली कर डाला है. अब इतनी बिगड़ी स्थितियों से निबटने के लिए 5  साल का वक़्त नाकाफी है. देश चमकेगा , पर उसे चमकाने के लिए हमें कम से कम 25  साल का वक़्त तो दीजिये. चिंता न कीजिए , हम साल में केवल 30 बार पेट्रोल के दाम बढ़ाएंगे"
                           पूरे पांच साल दोनों पार्टियों के सभी धुरंधर गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते हैं. अपने विरोधिओं को सभी प्रचलित और नवनिर्मित अपशब्दों से विभूषित करते हैं (जी हाँ , गालियाँ राजनीति का आभूषण हैं.). पांच साल बाद दोबारा चुनाव होते हैं.
                         इस बार विचित्र स्थिति है. 'चोर' और 'लुटेरा' दोनों ही पार्टियों के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त सीटें नहीं हैं. यही समय उसूल परिवर्तन के लिए उपयुक्त है , नेता इसे 'हृदय परिवर्तन' कहते है. वे उम्दा किस्म के हार्ट स्पेशलिस्ट हैं. बिना सर्जरी के ही इंसान के अन्दर कुत्ता, गधा, गीदड़ , भेड़िया, सूअर आदि जिसका मर्जी हृदय 'फिट' कर सकते हैं. मैंने ऐसे-ऐसे नेताओं को देखा है जिनके अन्दर ये सारे दिल एक साथ मौजूद रहते हैं, उपयोगिता के हिसाब से वो जो मर्जी हो उसको 'एक्टिवेट' कर लेते हैं और  बाकी को ऑफ मोड पर रखते हैं. ये उत्तम किस्म की टेक्नोलोजी है. पर इसकी इफेक्टिव प्रोसेसिंग के लिए इंसान का दिल निकाल फेंकना पहले जरूरी है. देशहित में हमारे ये महान नेता ये काम पहले ही कर चुके हैं.
                             बात चुनाव के नतीजों की हो रही थी. नतीजे कुछ इस तरह हैं की एकमत से सरकार बनना नामुमकिन है. अब दोनों राष्ट्रप्रेमी पार्टियाँ देशहित में अपने रबड़ के उसूलों को तोड़ मरोड़कर एक नए निष्कर्ष पर पहुँचते हैं - 'संयुक्त सरकार' !!!  छः महीने अमरीकापरस्त विकास के दुश्मन 'चोर' कुर्सी सम्हालें और छः महीने भ्रष्टाचारी, माँ के व्यापारी 'लुटेरे' गद्दीनशीन हों. फिर छः महीने चोर, फिर छः महीने लुटेरे................. इस तरह पूरे पांच साल तक ये दोनों देश को बिरयानी समझकर लोकतंत्र के अचार के साथ आराम से खाते रहेंगे. पांच साल तक दोनों का मन एक दूसरे से मिला रहेगा. यही भारत की महान संस्कृति है, धर्मग्रंथों में भी लिखा है - "सारा जाता देखकर आधा लीजे बाँट." भारतीय दर्शन को हमारी दोनों सुसंस्कृत पार्टियों ने आत्मसात कर लिया है. पांच साल बाद अचानक दोनों के उसूल फिर अलग अलग हो जायेंगे और दोबारा एक दुसरे पर गालियों और जूतों की बौछार शुरू हो जायेगी. कैसी सुन्दर व्यवस्था है ! ऐसा निस्वार्थ और निष्काम कर्मयोग तो गीता में भी दुर्लभ है.
                       दशरथ की कहानी सुनने , समझने और मानने वाले हैरान हैं. वो आँखें फाड़-फाड़कर देख रहे हैं. यह क्या हुआ ?
                       अरे मूर्खों ! तुम ऐसे ही आँखें फाड़ते-फाड़ते मर जाओगे. तुम गरीबी और भुखमरी के मारे हो , ऐसे उच्च विचारों को समझना तुम्हारी सामर्थ्य के बाहर है. तुम्हारी अक्ल पर पत्थर पड़े हैं और तुम उसूल भी लोहे पत्थर के बनाते हो. तुम्हारी क्या औकात कि तुम रबड़ कि importance समझो ! काश तुम इन रबड़ के मुखौटों को समझते तो तुम्हारी ये हालत न होती. तब तुम अपनी ताकत और उसका इस्तेमाल करना भी जानते. काश तुम्हें भेड़ की खाल में भेड़िये की पहचान होती. तुमने अपनी सारी जिंदगी ईंट पत्थर के उसूलों को चमकाने में निकाल दी और पीढ़ियो से सड़ते आ रहे हो और न जाने कब तक सड़ोगे ? तुम्ही में से कुछ ने टाइम के साथ - साथ अपने उसूलों का मटेरिअल बदला और नतीजा तुम्हारे सामने है. अब जाओ और अपनी बदहाली पर सर पीटो. तुम इसी लायक हो की चोर और लुटेरे एक साथ तुम्हारा बलात्कार करें. मैं तुम्हारी तरह लकीर का फ़कीर नहीं हूँ. मैं 'लोकतंत्र जिंदाबाद' भी लिख देता हूँ और जरुरत पड़ने पर लोकतंत्र की बुराई में भी निबंध लिख सकता हूँ. मैं शराब की खामियों पर भी भाषण दे सकता हूँ और उसकी खूबियों पर भी समां बांध सकता हूँ . तुम रोते रहो मैं चलता हूँ, मुझे 'चोर' पार्टी के प्रमुख की शपथग्रहण के बाद का भाषण लिखने का कांट्रेक्ट मिल चुका है , बहुत काम है.


* कम लोग जानते हैं कि तत्कालीन फिल्मकारों ने प्रेमचंद कि रचनाओं को फिल्म निर्माण के लिए चुना था पर प्रेमचंद ने किसी भी कीमत पर अपनी रचनाओं को edit  करने से इनकार कर दिया और ज्यों का त्यों पेश करना निर्माताओं के लिए संभव नहीं था, लिहाजा वह कांट्रेक्ट आगे नहीं बढ़ा और प्रेमचंद कि उम्र मुफलिसी में कटी. 

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Monday, 30 April 2012

श्रमिक दिवस पर यों ही ..........


श्रमिक दिवस पर यों  ही ..........


कई अन्य महत्वपूर्ण या कथित महत्वपूर्ण तिथियों की भांति भारतवर्ष श्रमिक दिवस भी औपचारिकता पूर्ति मात्र  है. शायद मैंने ज्यादा कह दिया , यह वास्तव में औपचारिकता भी नहीं है. वाजिब भी है , खालिस वाजिब . १ मई का इतिहास उठाकर देख लीजिए , कुछ १८८० के लगभग अमेरिका में मजदूरो ने मांगे उठाई , संघर्ष किया और छह सात साल बाद उनमे से कुछ को वहां की सरकार  ने स्वीकृत किया और मजदूर दिवस का अविर्भाव हुआ .
        
भारतवर्ष तब गुलाम था , न जनता स्वतंत्र थी न मीडिया . स्वतन्त्र होने पर अपने ही लोग शासक  बन बैठे .मजदूर और आम आदमी पर अपने लोग अत्याचार क्यों करते भला और अगर किसी   को यह अत्याचार लगे तो यह उसका दोष है , उसकी समझ का दोष है. १ मई का औचित्य अगर मैंने कही पाया तो वह बस जनरल नालेज की किताबो में या सरकारी नौकरी की परीक्षा में १ अंक वाले बहुविकल्पीय प्रश्नों में .

 भारतीय जनता का एक बड़ा भाग श्रमिक है , पर मजदूरों की एकता, संघर्ष और उनकी मांगो के आगे प्रशासन  को झुकते अगर देखा है तो  केवल बॉलीवुड की फिल्मो में.  अमेरिका में मजदूरों ने अपने २४ घंटो के विभाजन को मुद्दा बना आन्दोलन किया - ८ घंटे काम , ८ घंटे मनोरंजन और ८ घंटे आराम . हमारे यहाँ ऐसा मजदूर मिलना मुश्किल है ( गौर तलब है की यहाँ सिक्यूरिटी गार्ड भी १२ घंटे काम करते हैं ) . फिर भी मजदूर विरोध नहीं करता .ऐसा नहीं कि हमारे संविधान में मजदूरों के अधिकार वर्णित नहीं है , पर मजदूर क्या करे ? उसके बच्चों ने कॉन्वेंट की जनरल नालेज की बुक नहीं पढ़ी , न उसने सरकारी नौकरी की प्रवेश परीक्षा दी और न ही हमारे जागरूक समाज में वह यह जागरूकता सीख पाया . १४ वर्ष तक के बच्चे से काम कराना जुर्म है और १८ साल तक के बच्चे से उद्योग कार्य लेना जुर्म है , ऐसा श्रमिक क़ानून में लिखा है , पर बच्चे की आयु का निर्धारण कैसे हो और जब बच्चे के माँ बाप ही उससे काम करवाएं तो बाल श्रम क़ानून क्या करे  ?
                              बर्तन धोते बच्चे और घरो की सफाई करती गर्भवती स्त्रियाँ तक  हमारे देश में मजदूर दिवस कि प्रासंगिकता का सुबूत तो हैं ही , साथ ही जगतगुरु भारतवर्ष के सामाजिक सौहार्द का नमूना भी हैं.

Monday, 9 January 2012

रोना किसलिए ?

तब समय निराला रहता था ,
जीवन मय प्याला रहता था ,
जो पत्थर सम भरी है अब ,
वह मन मतवाला रहता था ,



पर टूट गया जब छूट गया
रक्षक ही निधि जब लूट गया

अब सार नहीं , आधार नहीं ,
यह जीवन अब उपहार नहीं ,
वह मुस्काहट हर बार नहीं ,

और प्यार नहीं , पर रोना क्या ?

निज खुशियों पर हँसना भूले ,
उसकी पीड़ा पर दुखी हुए ,
खुद ज्यों के त्यों संतुष्ट रहे ,
उसके हित अथक प्रयत्न किये
फिर भी तो हाथ से फिसल गया,
मतलब बनते ही निकल गया.


अब जीवन में संगीत नहीं
वह जीत नहीं वह रीत नहीं
मन से प्यारा मनमीत नहीं
और प्रीत नहीं पर रोना क्या ?

होंगे वह और जो रोते हैं,
जो बाकी , वह भी खोते हैं.
फेरते निगाह भविष्यत् से ,
बोझा अतीत का ढोते हैं.

यहाँ थोड़ी अलग कहानी है,
खुशियाँ तो आनी जानी हैं .

माना अब वह सहचार नहीं ,
अभिसार नहीं, आसार नहीं .
पर हृदय को दुःख स्वीकार नहीं ,
कुछ भार नहीं , तब रोना क्या ?

Sunday, 1 January 2012

राष्ट्रीय बेशर्मी

नव वर्ष दोबारा आना है , सब स्वागत को तैयार रहें .
डिस्को, भांगड़ा, वोदका, व्हिस्की और कैबरे की भरमार रहे .
खा पीकर सारे टुन्न बनें , उछलें कूदें नाचें गाएं ,
फिर पीकर झगड़ें , गाली दें , खुद पिटें और जूते खाएं .
दुश्मन को पीठ पीछे कोसें , अपनों से सीधा समर रहे ,
यह नीति हमारी अमर रहे , यह प्रीति हमारी अमर रहे.

जो अच्छा पिछले साल हुआ , उसपर उछलें ताली पीटें ,
जो बुरा हुआ उसको भूलें , कहकहा लगा सर को झींटे .
जीवन की विफलता भूल सभी खेलों की सफलता पर झूमें ,
हम शर्म को जूतों तले दबा सर तान के दुनिया में घूमें .
मरने वालों का नाम न लो , मुँह पर जीतों की खबर रहे .
यह गर्व हमारा अमर रहे , यह पर्व हमारा अमर रहे .

नेता सारे यह भाषण दें मरने वाले तो मरते हैं ,
दुश्मन को लगता मार रहे , वो जनसंख्या कम करते हैं .
इसको भी देश की विजय समझ मन में ही वेदना वार सहें ,
अगला हमला जल्दी होगा सब मरने को तैयार रहें .
जो आया उसको जाना है , फिर हमलों की क्यों फिकर रहे ?
धारणा ये अपनी अमर रहे , प्रेरणा ये अपनी अमर रहे .

यह देश राम गौतम का है , यहाँ दुःख में भी खुश रहते हैं ,
जब प्रियजन अपना मरता है , तब भोज करेंगे कहते हैं.
मरने पे भोज सबका करते , हर वर्ष ही श्राद्ध मानाते हैं ,
सब मरें और हमें दान मिले , कुछ सज्जन यह फरमाते हैं.
सबमें बसता है परमात्मा , जर देह आत्मा अजर रहे,
नव प्रण ये हमारा अमर रहे , दर्शन ये हमारा अमर रहे .

जो चले गए वह अमर हुए , उनके पीछे क्या पछताना ?
जो जायेंगे वो अमर होंगे , क्यों सुरक्षा को फिर बढवाना ?
अपनों की लाशें ना देखें , आतंकी लाशों पर नाचें ,
हमने भी उनके मारे हैं , दुनिया भर में गाकर बांचें .
इस वर्ष मित्रता दौरे हों , पानी की तरह फिर बजट बहे ,
सरगर्मी अपनी अमर रहे , बेशर्मी अपनी अमर रहे.

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Tuesday, 20 December 2011

ख़ाली रहना क्या इतना मुश्किल है ?


 अजीब सी समस्या है , पर सबकी है. सब इतने व्यस्त लाइफ स्टाइल के आदी हो गए हैं की कुछ समय अकेले या ख़ाली रहने से घबराहट होने लगी है. बस या ट्रेन का 4 -5  घंटे का सफ़र अकेले करना है. आप सबसे पहले क्या करेंगे . १०० में से ९० लोग घबरा उठेंगे . सफ़र की तैयारियों में समय काटने की तैयारियाँ सबसे ज्यादा जोर शोर से की जाएँगी . पत्रिकाएं , नॉवेल ख़रीदे जायेंगे या लैपटॉप में कोई अच्छी फिल्म सेव की जाएगी. मैंने सफ़र करते कई लोगों को देखा है, बहुत परेशान होते हैं, फिर नॉवेल खोलेंगे , फिर बंद करेंगे , हेडफोन कान में घुसायेंगे , फिर निकालेंगे , लैपटॉप खोलेंगे , बंद करेंगे कुछ तो बेचारे कपड़े तक उलट पुलट कर डालेंगे. सब करके देख लिया कमबख्त वक़्त ही नहीं कट रहा .
                 यही हम सबके साथ हो रहा है. अकेले रहने वाले की मुश्किलें और ज्यादा.काम ख़तम, अब घर में अकेले. न आदमी न आदमजात . क्या करें , TV देख लिया , पार्क में घूम आये. दोस्तों, रिश्तेदारों , प्रेमी , प्रेमिका सबको फोन कर लिया , सबकी गालियाँ सुन लीं . ऐसे आदमी को फोन करने पर लोग सुनाते ज्यादा है , जानते हैं बेचारा बुरा मान ही नहीं सकता . कल फिर फोन करेगा अपनी रामायण सुनाने के लिए.
               सज्जन बेचारा बहुत परेशान . समय ही नहीं कटता . ख़ाली बैठने के नाम पर बेचारे की नानी मर जाती है.  ऐसा नहीं कि महाशय बहुत मेहनती हैं. बॉस इनका हमेशा नाराज़ रहता है इनसे . पर इन्हें कोई न कोई चाहिए साथ देने वाला . ऑफिस में पड़ोस में बैठने वाले का जीना हराम कर देंगे . बस ट्रेन इत्यादि में सहयात्री का खून पियेंगे .दोस्तों को कॉल कर करके मार डालेंगे , क्या करें - ख़ालीपन खाए जाता है.
        एकांत में खुद के साथ रहने से इतनी चिढ क्यों होने लगी है हमको ? बहुत सी चीजें की जा सकती हैं , बहुत कुछ खोजा जा सकता है . अपने को सोचो , अपनी रुचियों को विकसित करो. कब आखिरी बार तुमने खाना बनाया है ? आखिरी बार कब तुमने कुछ लिखा ? कब आखिरी बार तुमने कुछ ख़रीदा था ? आखिरी बार कब किसी म्यूजियम  या सर्कस गए थे ? अकेले और अपनी पसंद की फिल्म कबसे नहीं देखी ? आखिरी बार कब कोई mathematics की समस्या निपटाई है , कबसे किसी की हंसी नहीं उड़ाई , यों अपनी हंसी उडवाते रहते हो जब- तब .
                                           अकेलापन इतना बुरा नहीं. खुद का साथ इतना बोर करने वाला नहीं है जितना तुम सोचते हो , तुम उनके साथ 'time spend ' करना चाहते हो जो तुम्हारे साथ ' Time  Pass ' करने की सोचते हैं. तभी जब उनकी मर्जी होती है तुमसे मजे लेते हैं और जब तुम उनसे तब बात करते हो जब उनका मन न हो , तो वे झल्ला पड़ते हैं. सोने पर सुहागा यह की तुम्हें गुस्सा नहीं आता बल्कि तुम अफ़सोस करते हो की मैंने फ़लाने को डिस्टर्ब कर दिया. पर जब वो तुम्हें डिस्टर्ब करता है तो तुम नाराज नहीं होते , खींसें निपोरते हो और उसके साथ लग जाते हो यह भूलकर की उसने पिछली बार तुमसे कैसा सुलूक किया था. खुद से दूर होकर , अपना यथार्थ , अपनी originality खोकर तुम क्या हो गए हो ? समय बिताने और समय काटने में फर्क है. इस फर्क को समझो, महसूस करो. समय तुम काटना चाहते थे पर लोगों ने तुम्हें समय काटने का जरिया बना लिया धीरे - धीरे. कई तो तुम्हें देखकर कहते भी होंगे - "वो देखो टाइमपास आ रहा है." ये हालत दयनीय है. कुछ आत्मसम्मान रखो , निर्भर ही रहना है तो आत्मनिर्भर रहो , अपने सबसे अच्छे और सच्चे साथी तुम स्वयं हो.

Saturday, 3 December 2011

ईर्ष्यालु

नैनीताल विहार का बना कार्यक्रम नेक ,
पिकनिक पर बारह युवक साथ में कन्या एक .

लड़की को इम्प्रेस करने को क्या-क्या करतब दिखलाते हैं ,
खाई में कभी उतरते हैं , पेड़ पर कभी चढ़ जाते हैं .
Mr. A चेन स्मोकर हैं , सिगरेट के छल्ले उड़ा रहे ,
भाई B को ये पसंद नहीं कैंसर के कारण बता रहे .



ये कहते फिजूलखर्ची है , वो कहते हैं स्टाइल है ,
दोनों का परम अभीष्ट एक , जो कन्या की smile है .
Mr C बॉडी बिल्डर हैं , बोले सेहत ही खज़ाना है .
दुबले D  भाई कहते हैं , अब स्लिम बॉडी का ज़माना है .

ऐसे ही वे पर दोषों पर निज गुण को श्रेष्ठ बताते हैं ,
लड़की जिसको लाइन दे दे , सब उसके विरुद्ध हो जाते हैं .
चलते - चलते सबने देखा एक व्यक्ति बन्दर पकड़ रहा ,
बन्दर कुछ न कर पाते हैं ऐसे फंदे में जकड़ रहा .
फंदे से मुक्त पुनः करके प्राणी को ड्रम में डाल रहा .
ड्रम पर कोई ढक्कन न देख सबने ही उसको मूर्ख कहा .

इक सज्जन बोला बेवकूफ ! कुछ तेरे हाथ न आएगा ,
ये jumping expert होता है पल में बाहर आ जायेगा .
वह सादर बोला खुद देखें पंद्रह को पकड़ चूका हूँ मैं.
एक भी नहीं बाहर आया नहीं यूँ ही अकड़ रहा हूँ मैं.

आश्चर्यचकित से होकर के सबने इसका कारण पूछा.
वह बोला असली मूर्ख तुम्हीं जो इतना तुमको न सूझा.
यह सच है कोई भी बन्दर यह सुगम कार्य कर सकता है.
पर हम इंसानों के जैसा यह भी ईर्ष्यालु होता है.

जब कुछ बन्दर प्रयत्न करके ड्रम के मुंह तक आ पते हैं,
तब उनके ईर्ष्यालु भाई उन्हें खींच के नीचे लाते हैं.
जो मानव अवगुण होते हैं वह इन सबके भी अन्दर हैं
हम कहने को ही मनुष्य हैं वस्तुतः हम सभी बन्दर हैं.

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Monday, 28 November 2011

Bachchan's good work


here's bachchan's philosophy . Although he became great because of congress's support which he earned for his originality as a civilian, he was not independent to write anything which came to his mind , he couldn't write against emergency , drawbacks of "Panchvarshiya yojnas" , and government and had to restrict himself in philosophy and romance............. However he had a great brain and great philosophical view.......   Here's one of the best work which motivates me to forget biggest losses in life......








जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फ़िर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फ़िर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आंगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिट्टी के बने हुए हैं
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं,मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई
                                                  —   हरिवंशराय बच्चन