Sunday, 1 May 2011

क्या उसको प्यार कहोगे ?


अब मेरे भूखे रहने से तुमको फर्क नहीं पड़ता है, ,
और तुम्हारा प्राणांतक श्रम मुझको तनिक नहीं हड़ता है.
नहीं प्रशंसा अब एक दूजे से केवल उपलंभ का नाता,
तुमको मेरा मुझे तुम्हारा कोई नखरा रूप ना भाता.
मिलने जुलने बतलाने में नहीं रहा जब रस तब फिर क्या
चंद बार के शारीरिक संबंधो को ही प्यार कहोगे ?

अब बतियाना खाना पूरी मिलने से कुछ मिटे न दूरी
कष्ट तुम्हारा मुझे हसाए तुम्हे रुचे मेरी मजबूरी
अब दिल नहीं तुम्हारा दुखता पीड़ा जब मुझको तडपाती
तुम पर जब संकट मंडराए तब मेरी फटती नहीं छाती 
इसपर भी इक दूजे कि पीड़ा पर व्याकुलता का दिखावा,
व्यर्थ दिलासाझूठी तसल्ली को ही क्या आधार कहोगे ?
इक दूजे हित जो किया धरा उसकी ही चर्चा अब आये
जो प्रेम हेतु थे कष्ट सहे वह अब उपकार की उपमा पाए
मेरा उपकार बड़ा, तेरा छोटा तू परम कृतघ्न रहा,
तुमने न कोई एहसान किया, अब यही वार्तालाप रहा.
क्या बतलाने जतलाने ही को , इक दूजे हित रोए थे ?
क्या आक्षेपों से भरे हुए , इस विवाह को साहचर्य कहोगे?
मिलने जुलने बतलाने में , नहीं रहा जब रस तब फिर क्या,
चंद बार के शारीरिक संबंधो को ही प्यार कहोगे .....

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Wednesday, 20 April 2011

जाओ क्या साथ निभाओगे ?

जाओ क्या साथ निभाओगे ?

                                 - मयंक शर्मा

जीवन पथ मेरा दुर्गम है ,
फिर काँटों से भी भरा हुआ .
मंजिल की कोई आस नहीं ,
कोई साधन भी है पास नहीं.
चलते चलते थक जाओगे
तब तुम क्या साथ निभाओगे ?

उल्लास का इसमें नाम नहीं,
यह कोई रास्ता आम नहीं.
यहाँ समय नहीं सुस्ताने को,
हसने को , मन बहलाने को .
नीरस कब तक चल पाओगे
और कब तक साथ निभाओगे??

ज़िम्मेदारी ने जकड़ा है,
यह बहुत कठिन पथ पकड़ा है.
स्वेच्छा से सफ़र नहीं होता है,
हर कदम पे एक समझौता है.
कितना मन को समझोगे ,
और कितना साथ निभाओगे ?

जाने कितनो ने छोड़ा है ,
कितनो ने ही मुंह मोड़ा है,
यहाँ गुजर  नहीं है वादों की,
यहाँ गरज है अटल इरादों की.
कैसे वह स्तर पाओगे ?
जाओ , क्या साथ निभाओगे ??